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प्रधानमंत्री जन औषधि योजना

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केंद्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री जन औषधि योजना के तहत आपको सस्ती दवाओं की सुविधा मिल सकती है। इसका एक मात्र उद्देश्य यह है कि कम कीमत पर गरीब और सामान्य परिवार के लोगो को दवा पहुचाना। साथ ही यह दवा के क्षेत्र में व्यापार करने वालो के लिए कम खर्च पर एक अच्छी योजना भी है । हम आपसे यह कहे कि बाजार में मेडिकल स्टोर पर बिकने वाली दवाइयों पर साठ से सत्तर फीसदी के कम कीमत पर आपको दवा मिल सकती है। तो आप जरूर जाना चाहेगें यह कैसे हो सकता है। अहमदाबाद कि रहने वाली हितेशरि कि जन औषधि केंद्र का दुकान है और यह लगभग एक वर्ष से अपना यह स्टोर चला रही है। वे कहती है कि ग्राहक काफी खुश है। वे सामने से आकर दवा के गुणवक्ता के बारे में बताते है कि यहाँ कि दवा खाने से मेरा रोग खत्म हो गया है। वही वह यह भी कहती है कि जो मरीज एक दवा लेकर जाता है वह दुबारा भी आता है। दवा भी समय पर हमें मिल जाती है। वही यहाँ दवा लेने वाले ग्राहक सरकार के इस योजन काफी खुश है और कहते है की हमें कम दाम पर अच्छी दवा मिल रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह बहुत अच्छा कदम उठाया है। हम काफी ...

चलो फिर याद करे उन वीरो को जो वतन के वास्ते हस्ते हस्ते दफन हो गए .

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१. भगत सिंह भगत सिंह का जन्म २७ सितंबर १९०७ को हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह एक सिख परिवार था। अमृतसर में १३ अप्रैल १९१९ को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी। काकोरी काण्ड में राम प्रसाद बिसमिलह  सहित ४ क्रान्तिकारियों को फाँसी व १६ अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि पण्डित चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन  से जुड गये और उसेएक नया नाम दिया हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक  एसोसिएशन  इस संगठन का उद्देश्य सेवा, त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था। भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर १७ दिसम्बर १९२८ को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे० पी० सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की थी। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलक...

स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज का जीवन परिचय .

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    जन्म और बाल्यकाल सिन्धु नदी के तट पर स्थित सिंध प्रदेश (पाकिस्तान) के हैदराबाद जिल्हे के महराब चन्दाइ नामक गांव में ब्रह्म क्षत्रिय कुल में श्री टोपनदास गंगाराम जी का जनम हुवा था। वे गांव के सरपंच थे। साधू संतो के लिए उनके दिल में सम्मान था। उनकी दो पुत्रियाँ थी पर उनको पुत्र नही था। एक बार पुत्र इच्छा से प्रेरित होकर श्री टोपनदास अपने कुलगुरु श्री रतन भगत के दर्शन के लिए पास के गांव तल्हार में गए और वहां पर हाथ जोड़कर अपनी पुत्र इच्छा कुलगुरु को बताई. कुल गुरु ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हुवे कहा :- " तुम्हे १२ महीने के भीतर पुत्र होगा जो केवल तुम्हारे कुल का ही नही परन्तु पुरे ब्रह्म क्षत्रिय समाज का नाम रोशन करेगा. जब बालक समझने योग्य हो जाए तब मुझे सोंप देना" संत के आशीर्वाद से, सिन्धी पंचाग के अनुसार संवत १९३७ के २३ फाल्गुन के शुभ दिवस पर टोपनदास के घर उनकी धर्मपत्नी हेमीबाई के कोख से एक सुपुत्र का जनम हुवा. जनम कुंडली के अनुसार बालक का नाम लीलाराम रखा गया। पाँच वर्ष की अबोध अवस्था में ही सिर पर से माता का साया चला गया, तब चाचा और चाची...

मनमे की गहराई में बसी हुई छोटी - बड़ी शंकाओ का समाधान सत्संग ...

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आज कई साधक भाई बहनों के मन में अजीबसे सवालों चल होगे , आपके मन शांति होगी तो आपका पड़ोसी व्यर्थ के तर्क खड़े कर परेशान कर रहा होगा . जैसे की .... ३ साल से ज्यादा समय हो गया अभी तक कोई सुभ संदेश नहीं   ?? बापूजी तो ब्रह्ज्ञानी महापुरुष हे फिर भी ऐसा क्यों      ?? कई नेता बापूजी के पास आते थे आज क्यों नहीं आते     ?? बापूजी कोई चमत्कार क्यों नहीं करते  ???? . etc etc ... इश प्रकार के सवालों हमारे मनमे उठाना या पूछे जाना स्वाभाविक हे ,और कई साधक भाई सत्संग सुमिरन में कम पर व्यर्थ के तर्क में ज्यादा घिरे हुवे हे . पर हमें इन सारे अर्थहिन् सवालों के जवाब न्यूज़ , व्हाट्सउप , फेसबुक के लाइव अपडेट से नहीं मिलेगे . इसके लिए जरुरी हे बापूजी , सुरेशबापजी के सत्संग के श्रवण की , बापूजी ने इन सारे सवालों के उत्तर दिए हुवे ही हे . बस हमें अपनी समज़ विकसित करनी हे जवाब अपने आप मिल जायेगा . चलो इन सारे सवालों को रामायण के द्रष्टान्त से समज़ते जो बापूजी अपने सत्संग में सुनाया करते थे .. रामायण में भी दो ऐसे प्रसंग आते हे जिनमे भगवान श्रीरा...

छत्रपति शिवाजी महाराज की कर्मयोग की दीक्षा .

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समर्थ रामदाश के श्री चरणों में शिवाजी महाराज ने संन्यासी होने की दीक्षा की मांग की , लेकिन समर्थ साईं ने कहा " में संन्यास की दीक्षा नहीं देता हु , कर्म संन्यास की दीक्षा देता हु , कर्म करते हुवे भी तुम संन्यासी की पद को पा सको , यवनों से जुल्मियो से समाज दब गया हे , शिवा अगर तुम संन्यासी हो जावोगे तो इश दबे हुवे समाज को कोन जगायेगा कोन सेवा करेगा में तुमे दीक्षा तो देता हु , लेकिन कर्म करते समय भी निर्लेप होने की दीक्षा देता हु " समर्थ ने गिरी गुफा में योग करने की दीक्षा नहीं दी , मठ मंदिर में बैठकर साधना करने की दीक्षा नहीं दी , युध्ध करते समय भी साधना का फायदा मिले ऐसी दीक्षा दे दी . शिवाजी महाराज को दीक्षा देते समय प्रसादी में   दो चुल्लू (खोबा) भरकर मिटटी दी  . दूसरी प्रसादी दी घोड़े की लिट् खोबा भरके और तीसरी प्रसादी दी नारयेल .  शिवाजी तीनो प्रसादी लेकर माँ के पास पहुचे , " माँ गुरुजी ने दीक्षा की प्रसादी में ये दिया मेरेको , मिटटी दी में रहस्य नहीं समज़ा ".  माँ ने कहा " बेटा गुरु ने मिटटी दी तू महीपति बनेगा (राजा बनेगा ) , लिट् दी हे तेरे बसतल...

पश्चिमी शिक्षा किस तरह गुलाम बनाती हे , अवस्य पढ़े ..

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  दोस्तों आज में लिखने जा रहा हु की यूरोपीय शिक्षा हमें किस तरह से उसके मानसिक गुलाम बनाते हे . हम सभी जानते हे की हमारे यहाँ आंग्रेजो ने काफी साल राज किया और उनके एक फल स्वरूप हमें अंग्रेजी सिक्षा व्यवस्था सोड़कर चले गए पर क्या आप जानते हो की आज वही शिक्षा व्यवस्था हमें अंग्रेजो के तोर- तरीके , कल्चर , और विचारो के गुलाम बनाते हे . इश बातको अच्छी तरह समजने के लिए  में आप को उन वियतनामी के बारे में बताता हु जिससे आप अच्छी तरह से समज जावोगे की अंग्रेजोने शिक्षा देने का षड्यंत्र क्यों किया था .   वियतमान जो भारत की तरह एक ज़माने में फ्रांसीसियो का गुलाम था , यहाँ के किशानो के गुलामो की तरह मजदूरी करवाकर  कीमती चीजे व चावल का एक्सपोर्ट अपने देश ( यूरोप ) में करते थे . फ़्रांसिसी उपनिवेशवाद सिर्फ आर्थिक शोषण पर केन्द्रित नहीं था . इसके पीछे ' सभ्य ' बनाने का कुविचार भी काम कर रहा था . जिस तरह भारत में अंग्रेज दावा करते थे उसी तरह फ्रांसीसियो का दावा था की वे वियतनाम के लोगो को आधुनिक सभ्यता से परिचित करा रहे हे . उनका विस्वाश था की उरोप में सबसे विकसित सभ्यता कायम हो च...

Know 10 Some Basic Yogasana ( जानिए ऐसे १० योगाशन जो आपके जीवन - संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक हे )

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साधारण मनुष्य अन्नमय , प्राणमय और मनोमय कोष में जीता हे . जीवन की तमाम सुशुप्त शक्तियां नहीं जगाकर जीवन व्यर्थ खोता हे . इन शक्तिओ को जगाने में आपको आशन खूब सहायरूप बनेगे . आशान के अभ्याश से तन तंदुरस्त , मन प्रसन्न और बुध्धि तीक्ष्ण बनेगी . जीवन के हर क्षेत्र में सुखद स्वप्न साकार करने की कुंजी आपके आंतर मन में सुपी हुई पड़ी हे . आपका अदभुत सामर्थ्य प्रकट करने के लिये ऋिषयों ने समाधी से समप्राप्त इन आसनों का अवलोकन किया हे . 1. सिद्धासन : पद्मासन के बाद सिद्धासन का स्थान आता है। अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त करने वाला होने के कारण इसका नाम सिद्धासन पड़ा है। सिद्ध योगियों का यह प्रिय आसन है। यमों में ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ है, नियमों में शौच श्रेष्ठ है वैसे आसनों में सिद्धासन श्रेष्ठ है। ध्यान :आज्ञाचक्र में और श्वास, दीर्घ, स्वाभाविक . विधिः आसन पर बैठकर पैर खुले छोड़ दें। अब बायें पैर की एड़ी को गुदा और जननेन्द्रिय के बीच रखें। दाहिने पैर की एड़ी को जननेन्द्रिय के ऊपर इस प्रकार रखें जिससे जननेन्द्रिय और अण्डकोष के ऊपर दबाव न पड़े। पैरों का क्रम बदल भी सकते हैं। दोनो...